हल्द्वानी: बनभूलपुरा रेलवे भूमि मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार, रेलवे और याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद पुनर्वास प्रक्रिया को तय समय में पूरा करने के निर्देश दिए। साथ ही स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करने वालों को उसी स्थान पर रहने का अधिकार नहीं है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पुनर्वास, मुआवजा और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत वैकल्पिक आवास देने की बात रखी। केंद्र की ओर से बताया गया कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक हर महीने दो हजार रुपये का भत्ता भी दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों की पहचान कर पुनर्वास की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि बनभूलपुरा में 19 से 31 मार्च के बीच शिविर लगाया जाए। इस दौरान पात्र परिवारों की सूची तैयार की जाएगी और उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए आवेदन कराने में मदद दी जाएगी। कोर्ट ने नैनीताल के जिलाधिकारी, एसडीएम हल्द्वानी और राजस्व अधिकारियों को इस प्रक्रिया में पूरा सहयोग देने को कहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर योजना की जानकारी देने के भी निर्देश दिए गए हैं। पूरी प्रक्रिया की रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले कोर्ट में पेश करनी होगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि करीब 50 हजार लोग यहां दशकों से रह रहे हैं और बहुत कम परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता में आते हैं। बाकी परिवारों के पुनर्वास की स्पष्ट नीति होनी चाहिए। उन्होंने यह भी दलील दी कि कई लोग पट्टे वाली जमीन पर बसे हैं और बस्तियों के नियमितीकरण पर विचार होना चाहिए।
वहीं रेलवे का कहना है कि करीब 30 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा है और ट्रैक विस्तार सहित अन्य परियोजनाओं के लिए इस भूमि की सख्त जरूरत है। यह उत्तराखंड में रेलवे विस्तार के लिए अंतिम समतल क्षेत्र है, जिसके बाद पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थिति यथावत रखते हुए कहा कि अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। अगली सुनवाई में भूमि स्वामित्व, मुआवजा और पुनर्वास के कानूनी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।
