हल्द्वानी: सरोवर नगरी नैनीताल की पहाड़ियां ऊपर से भले ही स्थिर नजर आती हों, लेकिन जमीन के भीतर हो रही हलचल चिंता बढ़ाने वाली है। शोधकर्ताओं और भूविज्ञानियों के संयुक्त अध्ययन में नैनीताल का करीब 24.9 प्रतिशत भूभाग यानी 17.08 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अत्यधिक भूस्खलन जोखिम वाली श्रेणी में पाया गया है। वहीं 59.6 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम वाला बताया गया है।
अध्ययन में नैनीताल के अलग-अलग हिस्सों में जमीन के स्तर पर लगातार हो रहे सूक्ष्म बदलाव दर्ज किए गए हैं। खास बात यह सामने आई कि पूरे शहर में जमीन की गति एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में जमीन नीचे धंस रही है, जबकि कुछ स्थानों पर इसके ऊपर उठने के संकेत मिले हैं।
यह निष्कर्ष वर्ष 2017 से 2024 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1ए उपग्रह से मिले आंकड़ों के पर्सिस्टेंट स्कैटरर इंटरफेरोमेट्री (PSI) तकनीक से किए गए विश्लेषण के आधार पर सामने आया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (यूपीईएस), देहरादून की रिसर्च स्कॉलर अचला जोशी, शोध मार्गदर्शक भूविज्ञानी प्रो. गिरीश चंद्र कोठियारी और अन्य शोधकर्ताओं का यह अध्ययन Bulletin of Engineering Geology and the Environment में सितंबर 2026 में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन के अनुसार, बलियानाला क्षेत्र में जमीन के धंसने की दर करीब 8 से 10 मिलीमीटर प्रतिवर्ष दर्ज की गई है। यह इलाका पहले से ही भूस्खलन और भू-धंसाव की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
इसके उलट शेर-का-डांडा क्षेत्र में जमीन के 6 से 8 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की दर से ऊपर उठने के संकेत मिले हैं। कुछ स्थानों पर यह दर 12 मिलीमीटर प्रतिवर्ष से अधिक भी दर्ज की गई। शोध के मुताबिक, जमीन की इस तरह की गतिविधियां पहाड़ी ढलानों में मौजूद भूगर्भीय तनाव और अस्थिरता की ओर संकेत करती हैं।
अध्ययन में नैनीताल की भूगर्भीय अस्थिरता के पीछे क्षेत्र में मौजूद प्रमुख भ्रंश संरचनाओं की भूमिका भी सामने आई है। इनमें मेन बाउंड्री फॉल्ट (MBT), नैनीताल फॉल्ट और कृष्णनगर फॉल्ट प्रमुख हैं। इसके अलावा बहुमंजिला निर्माण, पहाड़ी ढलानों पर बढ़ता भार और वन क्षेत्र में बदलाव को भी संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कारकों के रूप में बताया गया है।
अध्ययन के अनुसार, नैनीताल शहर का बड़ा हिस्सा पुराने भूस्खलन से जमा हुए मलबे और कमजोर भू-भाग पर बसा हुआ है। ऐसे में जमीन में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों की लगातार निगरानी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
शोधकर्ताओं ने संवेदनशील क्षेत्रों में उपग्रह आधारित निगरानी को नियमित करने और निगरानी व रोकथाम की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई है।

