हल्द्वानी: बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने की उम्मीद है। मामले को लेकर प्रशासन और संबंधित पक्षों की तैयारियां तेज हो गई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई सूची में शामिल है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर “9 सितंबर को अंतिम फैसला ही आएगा” कहना अभी उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के 24 फरवरी 2026 के आधिकारिक आदेश में मामले को आगे की सुनवाई और निर्देशों के लिए सूचीबद्ध करने की बात कही गई थी।
यह मामला हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास रेलवे और राज्य सरकार की जमीन पर लंबे समय से चले आ रहे अतिक्रमण विवाद से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस विवाद को लेकर बेदखली की कार्रवाई वर्ष 2007 से शुरू हुई थी और इसके बाद अलग-अलग अदालतों में कई दौर की कानूनी प्रक्रिया चली।
मामले में पिछले कुछ समय से सुनवाई की तारीखें लगती रही हैं। अब 9 सितंबर की प्रस्तावित सुनवाई को लेकर प्रशासन से लेकर प्रभावित परिवारों तक की नजर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर है।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, रेलवे और उत्तराखंड सरकार की ओर से मामले को जल्द सुनने का अनुरोध किए जाने के बाद 9 सितंबर की तारीख को लेकर उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर 9 सितंबर की प्रकाशित कॉज लिस्ट उपलब्ध है, लेकिन उससे अकेले यह पुष्टि नहीं होती कि इसी दिन इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया जाएगा। इसलिए खबर में इसे अहम सुनवाई/आगे के निर्देशों की संभावना के तौर पर रखना अधिक सटीक है।
सुप्रीम कोर्ट के 24 फरवरी 2026 के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2024 की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने रखा गया था कि करीब 30.040 हेक्टेयर सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण है। इस क्षेत्र में लगभग 4,365 मकान बने होने और 50 हजार से अधिक लोगों के रहने की जानकारी अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज की गई थी।
अदालत ने उस समय प्रभावित परिवारों की पहचान करने और उनके पुनर्वास के प्रस्ताव को रिकॉर्ड पर रखने के निर्देश दिए थे। बाद में केंद्र और रेलवे की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे में बताया गया कि हल्द्वानी प्रोजेक्ट के तहत करीब 30.65 हेक्टेयर जमीन रियलाइन्मेंट के लिए आवश्यक है।
24 फरवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत पात्रता के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में मदद करने के निर्देश दिए गए थे।
अदालत ने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (USLSA) को पुनर्वास कैंप आयोजित करने और प्रभावित परिवारों को आवेदन करने में सहायता देने को कहा था। जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को भी इस प्रक्रिया में सहयोग करने के निर्देश दिए गए थे।
अदालत के आदेश के मुताबिक, परिवारवार पात्रता का निर्धारण कर इसकी स्थिति रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की जानी है। अदालत ने प्रभावित परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से जुड़ी रिपोर्ट भी मांगी थी।
मामले में प्रभावित पक्षों की ओर से रेलवे की जमीन के स्वामित्व, बेदखली की प्रक्रिया और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर आपत्तियां उठाई गई हैं। वहीं रेलवे और केंद्र की ओर से जमीन को रेलवे परियोजना के लिए जरूरी बताया गया है।
24 फरवरी के आदेश में केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया था कि प्रभावित क्षेत्र में 13 परिवारों के पास छोटे भूखंडों का स्वामित्व पाया गया है। यदि रेलवे परियोजना के लिए उनकी जमीन आवश्यक होगी तो कानून के अनुसार उसका अधिग्रहण किया जाएगा। वहीं अन्य कब्जाधारियों को संबंधित भूमि पर पुनर्वास का अधिकार नहीं होने की दलील दी गई थी।
रेलवे की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया है कि विवादित जमीन हल्द्वानी रेलवे परियोजना के लिए जरूरी है। इससे पहले अदालत के रिकॉर्ड में रेलवे स्टेशन के विस्तार और रेलवे सुविधाओं के विकास के लिए जमीन की आवश्यकता का उल्लेख भी किया गया था।
अब 9 सितंबर की सुनवाई में मामले की आगे की दिशा पर नजर रहेगी। कोर्ट की कार्यवाही के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस मामले में आगे क्या आदेश आता है और प्रभावित परिवारों तथा रेलवे की जमीन से जुड़े विवाद का अगला चरण क्या होगा।
वर्षों से अदालतों में चल रहा है मामला
बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद नया नहीं है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, रेलवे और राज्य की जमीन से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया वर्ष 2007 से चली आ रही है। वर्ष 2023 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और इसके बाद शीर्ष अदालत में लगातार सुनवाई हुई।
24 जुलाई 2024 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जमीन की पहचान, रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट और प्रभावित परिवारों की पहचान से जुड़े निर्देश दिए थे। इसके बाद केंद्र, रेलवे और राज्य सरकार की ओर से अलग-अलग रिपोर्ट और प्रस्ताव अदालत के सामने रखे गए।
अब 9 सितंबर 2026 की सुनवाई इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद में आगे की कानूनी दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

